Sunderkand

दोहा 19-24

श्री राम चरित मानस-सुन्दरकाण्ड (दोहा १९-दोहा २४) ॥दोहा १९॥ ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार। जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥ ॥चौपाई॥ ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥ तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥ जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥ तासु दूत …

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दोहा 55-60

श्री राम चरित मानस-सुन्दरकाण्ड (दोहा ५५-दोहा ६०) ॥दोहा ५५॥ सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥ ॥चौपाई॥ राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥ सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥ तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत …

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दोहा 49-54

श्री राम चरित मानस-सुन्दरकाण्ड (दोहा ४९-दोहा ५४) ॥दोहा ४९॥ रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥(क)॥ जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥(ख)॥ ॥चौपाई॥ अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥ निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु …

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दोहा 43-48

श्री राम चरित मानस-सुन्दरकाण्ड (दोहा ४३-दोहा ४८) ॥दोहा ४३॥ सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥ ॥चौपाई॥ कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥ सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥ जौं …

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दोहा 37-42

श्री राम चरित मानस-सुन्दरकाण्ड (दोहा ३७-दोहा ४२) ॥दोहा ३७॥ सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ ॥चौपाई॥ सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥ अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥ पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥ …

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दोहा 31-36

श्री राम चरित मानस-सुन्दरकाण्ड (दोहा ३१-दोहा ३६) ॥दोहा ३१॥ निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥ ॥चौपाई॥ सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥ बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥ कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव …

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दोहा 25-30

श्री राम चरित मानस-सुन्दरकाण्ड (दोहा २५-दोहा ३०) ॥दोहा २५॥ हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥ ॥चौपाई॥ देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥ जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥ तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहिं अवसर को हमहि उबारा॥ हम जो …

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दोहा 13-18

श्री राम चरित मानस-सुन्दरकाण्ड (दोहा १३-दोहा १८) ॥दोहा १३॥ कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास। जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥ ॥चौपाई॥ हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥ बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥ अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥ कोमलचित …

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दोहा 1-6

श्री राम चरित मानस-पञ्चम सोपान सुन्दरकाण्ड ॥श्लोक॥ शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं। ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌॥ रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं। वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥१॥ नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये। सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा॥ भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे। कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥२॥ अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं। दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌॥ सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं। रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥३॥ ॥चौपाई॥ जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत …

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दोहा 7-12

श्री राम चरित मानस-सुन्दरकाण्ड (दोहा ७-दोहा १२) ॥दोहा ७॥ अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ ॥चौपाई॥ जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥ एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥ तब …

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